Home

हिन्दी पत्रकारिताः अनुवाद में हिंग्लिश

अक्टूबर 15, 2008

(पिछले लेख से आगे) मैंने पिछली बार अपना मत व्यक्त किया था कि अनुवाद में भावों को महत्त्व दिया जाना चाहिए और उसके लिए संबंधित दोनों भाषाओं में शब्द के लिए शब्द वाला प्रयोग करना सदैव सार्थक हो यह आवश्यक नहीं । आवश्यक हो जाने पर नये शब्दों/पदबंधों की रचना करने अथवा अन्य भाषाओं से शब्द आयातित करना भी एक मार्ग है । कुछ भी हो यह निर्विवाद कहा जायेगा कि अनुवाद में संलग्न व्यक्ति को संबंधित भाषाओं पर अच्छी पकड़ होनी चाहिए और उसकी शब्दसंपदा दोनों में पर्याप्त होनी चाहिए । फिर भी समस्याएं खड़ी हो सकती हैं । मेरे विचार से साहित्यिक रचनाओं के मामले में अनुवाद-कार्य जटिल सिद्ध हो सकता है । वस्तुतः साहित्यिक भाषा अक्सर आलंकारिक तथा मुहावरेदार होती है और बहुधा ऐसे असामान्य शब्दों से भी संपन्न रहती है जो अधिसंख्य लोगों की समझ से परे हों । वाक्य-रचनाएं भी सरल तथा संक्षिप्त हों यह आवश्यक नहीं । कभी-कभार ऐसी स्थिति भी पैदा हो सकती है कि पाठक पाठ्य के निहितार्थ भी ठीक न समझ सके, या जो वह समझे वह लेखक का मंतव्य ही न हो । साहित्यिक लेखकों की अपनी-अपनी शैली होती है और लेखन में उनकी भाषायी विद्वत्ता झलके कदाचित् यह अघोषित कामना भी उसमें छिपी रहती है ।

इसके विपरीत वैज्ञानिक तथा व्यावसायिक विषयों के क्षेत्र में लेखन, जिसका थोड़ा-बहुत अनुभव मुझे है, में सरल तथा संक्षिप्त वाक्यों के प्रयोग की अपेक्षा की जाती है । इन क्षेत्रों में लेखक से यह उम्मींद की जाती है कि उसकी अभिव्यक्ति स्पष्ट हो और लिखित सामग्री उन लोगों के लिए भी बोधगम्य हो जो भाषा का विद्वतापूर्ण ज्ञान न रखते हों । संक्षेप में भाषा वस्तुनिष्ठ होनी चाहिए न कि व्यक्तिनिष्ठ । हां, लेखों को समझने में पाठक की विषय संबंधी पृष्ठभूमि का स्वयं में महत्त्व अवश्य रहता है ।

मेरी दृष्टि में पत्रकारिता की स्थिति काफी हद तक वैज्ञानिक आदि के क्षेत्रों की जैसी होनी चाहिए । मैं समझता हूं कि साहित्यक रचनाओं का पाठकवर्ग अपेक्षया छोटा होता है और उसकी साहित्य में विशिष्ट रुचि होती है । इसके विरुद्ध पत्रकारिता से संबद्ध पाठकवर्ग बहुत विस्तृत रहता है और पाठकों की भाषायी क्षमता अतिसामान्य से लेकर उच्च कोटि तक का हो सकता है । पत्रकार को तो उस व्यक्ति को भी ध्यान में रखना चाहिए जो लेखों को समझने में अपने दिमाग पर अधिक जोर नहीं डाल सकता है । इसलिए मैं तो यही राय रखता हूं कि पत्रकार सरल तथा स्पष्ट लेखन करे । यदि अन्य भाषा का मूल लेख इस श्रेणी का हो अनुवाद करना भी सरल ही होना चाहिए । कुछ भी हो यह तो तब भी आवश्यक ही माना जायेगा कि पत्रकार का संबंधित भाषाओं का ज्ञान अच्छा हो और तदनुकूल वह अपने भाषाज्ञान में उत्तरोत्तर सुधार करे ।

परंतु हिन्दी पत्रकारिता में लगे लोगों में क्या हिन्दी के प्रति इतना सम्मान रह गया है कि वे उस पर अपनी पकड़ को मजबूत करें । देश में इस समय जो स्थिति चल रही है उसमें पढ़े-लिखे लोगों के बीच हिंग्लिश का प्रचलन बढ़ता जा रहा है । मैं समझता हूं कि हिंग्लिश से प्रायः सभी परिचित होंगे । हिंग्लिश, जिसे कुछ लोग हिंग्रेजी कहना अधिक पसंद करेंगे, एक नयी वर्णसंकर भाषा है, जिसका व्याकरणीय ढांचा तो हिंदी का है किंतु जिसकी शब्दसंपदा पारंपरिक न होकर अंग्रेजी से उधार ली गयी है । वस्तुतः हिंग्लिश का हिन्दी से कुछ वैसा ही संबंध है जो उर्दू का है । पढ़े-लिखे लोगों की यह दलील है कि हमें मुक्त हृदय से अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करना चाहिए । इन ‘अन्य भाषाओं’ में कोई और नहीं केवल अंग्रेजी है । उनसे पूछा जाये कि उन्होंने बांग्ला-मराठी और थोड़ा आगे बढ़कर तेलुगू-कन्नड़ के कितने शब्द आयातित किये हैं तो वे निरुत्तर मिलेंगे । इस तर्क को मैं निहायत बेतुका मानता हूं और यह कहने में मुझे बिल्कुल भी हिचक नहीं होती कि यह ‘कुतर्क’ वे अपनी हिन्दी-संबंधी भाषायी अक्षमता को छिपाने के लिए देते हैं । उनका हिन्दी शब्द-भंडार इस कदर कमजोर हो चुका है कि वे हिन्दी में किसी विषय पर बोल ही नहीं सकते । लेकिन यही वे लोग हैं जो अंग्रेजी की शुद्धता के प्रति अतिसचेत मिलेंगें । भूले से भी वे कभी अंग्रेजी में हिन्दी अथवा अन्य देसी भाषाओं के शब्दों का प्रयोग करते हुए नहीं मिलेंगे । मुझे तो तब हंसी आती है जब इस प्रकार का कुतर्क स्वयं हिन्दी रचनाकारों के मुख से भी सुनता हूं ।

मैं दूरदर्शन पर प्रसारित समाचारों में थोड़ा-बहुत साफ-सुथरी हिन्दी सुन लेता हूं । समाचारों की यह गुणवत्ता निजी चैनलों पर कुछ कम मिलती है । समाचार कक्ष से प्रसारित समाचार कुछ हद तक सावधानी से लिखे रहते हैं । किंतु बाहर घटनास्थल से जीवंत वार्ता (लाइव न्यूज) पेश करने वाले संवाददाता के मुख से अंग्रेजी-मिश्रित हिन्दी ही सुनने को मिलती है । संवाददाता अपनी बात कुछ यूं कहता है (एक बानगी):-
“रशियन प्रेजिडेंट दमित्री मेद्वेदेव ने कहा है कि रूस अगले दो सालों में एअरक्राफ्ट कैरियर का लार्ज-स्केल कंस्ट्रक्शन लांच करेगा …”

आपत्ति की जा सकती है कि इस उदारण में कुछ अधिक ही अंग्रेजी शब्द हैं । मान लेता हूं, किंतु क्या कोई उक्त बात को कुछ यूं पेश करेगा ? –
“रूसी राष्ट्रपति दमित्री मेद्वेदेव ने कहा है कि रूस अगले दो सालों में वायुयान वाहकों का वृहत्तर स्तर पर निर्माण-कार्य आरंभ करेगा …”

शायद कोई इस प्रकार से समाचार लिख भी ले, परंतु बोलते वक्त तो स्वाभाविक तौर पर अंग्रेजी शब्द ही वार्ताप्रेषकों के मुख से निकलेंगे । लेकिन कोई भी अंग्रेजी पत्रकार भूले से हिन्दी शब्दों का प्रयोग करता हुआ नहीं पाया जायेगा, भले ही किसी उपयुक्त शब्द की तलाश में वह कुछ क्षण रुक जाये । इस सबके पीछे हमारी यह मानसिकता है कि हिन्दी में तो कुछ भी ठूंस दें चलेगा, परंतु अंग्रेजी में तो शुद्धता रखनी ही पड़ेगी । शुद्ध अंग्रेजी हमारी प्रतिष्ठा के लिए अनिवार्य है, और अंग्रेजीमिश्रित हिन्दी पर हम लज्जित होने की भला क्यों सोचे ? (हिंग्लिश पर अपने विचार बाद में अलग से कभी पेश करूंगा ।)

जब स्थिति यह हो कि पत्रकार अपनी बातें हिन्दी में प्रस्तुत करने में बेझिझक अंग्रेजी शब्द प्रयोग करें और कभी पूरा वाक्य ही अंग्रेजी का बोल जायें तो फिर अनुवाद की गुणवत्ता का प्रश्न कहां उठता है ? किसको चिंता होगी तब हिन्दी शब्दों की ? – योगेन्द्र

2 Responses to “हिन्दी पत्रकारिताः अनुवाद में हिंग्लिश”


  1. योगेंद्र जी, मुझे लगता है कि सरल भाषा का प्रयोग किया जाये तो शायद अग्रेजी के उतने शब्दों के प्रयोग करने की आवश्यकता कम हो जाये. मसलन आप के उदाहरण में यह कह सकते थे कि “.. हवाई जहाज ले जाने वाले जहाजों को बड़ी मात्रा में बनाना शुरु करेगा” ?
    रही बात अग्रेजी वालों के हिंदी शब्दों के प्रयोग की, तो विदेशी नजरों से उसे देखने का प्रयास करना कुछ मदद कर सकता है. भारत से आने वाले कागज़ो में अक्सर अँग्रेजी में लिखी रपटों में बहुत से शब्द इस तरह के होते हैं जिनके अर्थ केवल भारतीय ही जानते हैं. जैसे कि मेरे सामने भारत से आयी एक रपट में लाख, करोड़, बालवाड़ी, पंचायत जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है, जो अँग्रेजी नहीं.

  2. Rajeev Ranjan Prasad Says:

    angreji sabdo ke himayati aksar hindi sabad sampad ke aprayapat hone ka rona rote hain, jabaki hakikat me unki mansa angregi mansikta ke bojh tale dabi hai. aapne jo prashan marathi, telgu ya kannad ke vishay me kahi hai, uska satik javab siva bangla jhankne ka kuchh bhi nahi najar aata…., aapke agale lekh ki partiksha me……….,


एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: