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हिन्दीः निजी अनुभव – 2

सितम्बर 26, 2008

पिछली शताब्दि के अंतिम दशक के आरंभ के आसपास अपने यूरोपीय अनुभव से प्रेरित होकर मैंने निर्णय लिया कि मैं जहां-जहां संभव हो सके वहां-वहां हिन्दी का प्रयोग करूं । किसी परिचित, मित्र, सहकर्मी अथवा अधिकारी से किसी भी प्रकार का प्रोत्साहन अथवा उत्साहवर्धन मुझे मिला हो ऐसा नहीं है । बल्कि मैं समझता हूं कि कई लोगों को मेरी बातें सनक भरी ही लगती रही होंगी । हां, खुलकर किसी ने नकारात्मक टिप्पणी की हो ऐसा नहीं है ।

मेरे कार्यक्षेत्र रहे विश्वविद्यालय में प्रायः सभी दस्तावेजी या लिखित कार्य अंग्रजी में ही होते हैं और उन दिनों भी होते थे, भले ही वहां कार्यरत निचले स्तर के कुछेक कर्मचारियों के लिए वह सब समझ से परे हो । मुझे एक वाकया याद है जब मेरे विभागीय कार्यालय का एक चपरासी एक बार एक नोटिस मेरे पास ले आया, जिसके साथ अध्यापकों की सूची की जीराक्स प्रति (अक्सर इस्तेमाल होने वाली) भी थी । सूची में उन-उन अध्यापकों के नामों के आगे निशान लगे थे जिनको वह नोटिस दिखायी जानी थी । मेरे नाम के आगे निशान नहीं लगा था । मैंने उस व्यक्ति को बताया कि बिल्डिंग के एक कोने में स्थित मेरे कमरे तक आने की जहमत उठाने की उसे जरूरत नहीं थी और यह भी कि जिन के नाम पर टिक किया था केवल उन्हीं के पास उसे जाना चाहिए । उसने मुझे बताया कि वह अंग्रेजी में लिखे नाम तो पढ़ नहीं सकता और उतने सारे लोगों का नाम याद रख पाना उसके लिए कठिन था । कहीं किसी नाम छूट जाये तो ख्वाहमख्वाह ही उसे डांट सुननी पड़ेगी ।

अवश्य ही अंग्रेजी का अतिशय प्रयोग, वह भी उन स्थलों पर जहां हिन्दी अधिक सुविधाजनक हो, मुझे स्वीकार्य नहीं था । मैंने सोचा कि अध्यापकों की सूची क्यों न हिन्दी में तैयार कर ली जाये । मैंने यह कार्य अपने ही जिम्मे ले लिया क्योंकि मुझे मालूम था कि यदि कार्यालय वालों पर छोड़ दिया तो कुछ भी होने से रहा । अतः दो-चार दिन के भीतर मैंने कंप्यूटर पर सूची तैयार की और बड़े बाबू को सोंप दी, ताकि वे उसकी जीराक्स कापी प्रयोग में ले सकें ।
कुछ वर्षों तक तो सब ठीक-ठाक चलता रहा । सालों तक कोई नियुक्ति भी नहीं हुयी, अतः सूची अपरिवर्तित रही । फिर शताब्दि का अंत आते-आते कुछ नये लोग विभाग में नियुक्त हुए । आरंभ में तो उनके नाम हाथ से अंग्रेजी में लिखे जाने लगे और अंत में नयी सूची अंग्रेजी में तैयार हो गयी । मेरा भी उस दिशा में उत्साह ठंडा पड़ गया क्योंकि मैंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का मन बना लिया था ।

लेकिन मेरा कार्य वैयक्तिक स्तर पर यथासंभव हिन्दी में चलता रहा । जैसा मैंने बताया कि वहां सब कुछ तो अंग्रेजी में था । राजभाषा के नियमों के अनुसार सभी फार्म द्विभाषी होने चाहिए । लेकिन ऐसा आज तक नहीं हुआ है । मैंने अपने समय में कई बार विश्वविद्यालय को याद दिलाया कि हिन्दी में भी फार्म उपलब्ध होने चाहिए । हर बार किसी न किसी बहाने प्रशासन टालता रहा । परंतु मैंने निर्णय लिया कि अंग्रेजी में छपे फार्मों की प्रविष्टयां मैं हिन्दी में ही भरूंगा । ऐसा मैं करता रहा । मेरा पत्राचार भी हिन्दी में होने लगा । मैंने जब स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का आवेदन पेश किया तो वह भी हिन्दी में ही लिखा । लेकिन उन सभी पत्रों आदि पर संबद्ध अधिकारियों की टिप्पणियां अंग्रेजी में ही हुआ करती थीं, जो कि राजभाषा नियमों के विरुद्ध था । पर परवाह किसे थी ?

मैंने तब अनुभव किया कि दो-चार लोग हों तो शायद कुछ किया जा सकता था । पर जिस तंत्र में सभी अंग्रेजी के प्रति समर्पित हों और उसके परे कुछ भी करने का विचार न रखते हों, वहां भला क्या हो सकता है ? भाषा के मामले में लोग क्यों जड़त्व से ग्रस्त हैं इस पर आगे चर्चा की जायेगी । – योगेन्द्र

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