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हिन्दीः निजी अनुभव – 1

सितम्बर 24, 2008

(पिछले चिट्ठे से आगे) अध्यापन के अपने जीवन में मेरा सर्वाधिक दिलचस्प अनुभव यह रहा कि विश्वविद्यालय स्तर के इक्के-दुक्के अध्यापकों को छोड़कर प्रायः सभी का हिन्दी के प्रति नकारत्मक रवैया रहता रहा है । किसी को भी (दो-एक अपवाद होंगे) मैंने उन मौकों पर हिन्दी का प्रयोग करते नहीं पाया जहां ऐसा करना संभव ही नहीं वांछनीय होता । इस बात को एक दृष्टांत से समझा जा सकता है ।

मेरे कार्यक्षेत्र रह चुके विश्वविद्यालय में कुलसचिव तथा परीक्षा-नियंता कार्यालयों एवं पुस्तालय आदि जैसे स्थानों पर छात्रों, शिक्षकों और आगंतुकों के लिए हस्ताक्षर पंजी (रजिस्टर) रहती हैं, जिनमें उनके आने-जाने का समय एवं अन्य विवरण हस्ताक्षर सहित दर्ज किये जाते हैं । परीक्षा-नियंता कार्यालय का अनुभव मेरे लिए खास रहा है, जहां केंद्रीय मूल्यांकन की प्रणाली प्रचलित थी । वार्षिक परीक्षाओं के बाद उत्तर-पुस्तिकाओं के चार-छः सप्ताह तक चलने वाले मूल्यांकन के लिए मुझे भी वहां जाना पड़ता था । मैं अपने आत्मना-पोषित नीति के अनुरूप उक्त रजिस्टर में देवनागरी लिपि में दस्तखत करता था । एक पृष्ठ पर करीब पच्चीस जनों के दस्तखत होते होंगे ऐसा मेरा अनुमान है ।

रजिस्टर के संबंधित पृष्ठ तथा उसके पूर्व के एक-दो पृष्ठों पर मैं जिज्ञासावश नजर डाल लिया करता था, यह देखने के लिए कि क्या मेरे अलावा और भी कोई व्यक्ति है जो हिन्दी में हस्ताक्षर करता हो । मुश्किल से कभी कोई अपवाद दिख जाता था । रोचक बात यह होती थी कि रजिस्टर के हर पृष्ठ के शीर्ष पर परीक्षकों के नाम, आने व जाने के समय आदि के शीर्षक स्तंभानुसार (कालमवाइज) देवनागरी में लिखे रहते थे । किंतु ठीक उनके नीचे दस्तखतों का सिलसिला चलता था, जो लगभग पूरी तौर पर अंग्रेजी में ही रहता था । खुद मेरे दस्तखत के बाद भी कोई यह नहीं सोचता था कि वह भी देवनागरी में हस्ताक्षर करे ।

विश्वविद्यालय स्तर के अध्यापकों को मुझ जैसा अदना व्यक्ति प्रेरित कर सकता हो यह मैं सोच नहीं सकता । आखिर योग्यता में सभी तो मेरे तुल्य या उससे ऊपर ही रहे हैं । जब मैं अपना स्वतंत्र निर्णय लेता रहा हूं और किसी के द्वारा प्रेरित किये जाने का इंतजार नहीं करता, तो मेरे लिए यह सोचना स्वाभाविक था कि वे भी स्वतः ही उचितानुचित का निर्णय लेते होंगे । साफ था कि उनकी हिन्दी तथा देवनागरी लिपि के प्रति कोई रुचि नहीं थी ।

और पूरे वाकये का मेरे लिए चौंकाने वाला पहलू यह था कि हिन्दी विभाग के अध्यापक तक अंग्रेजी में ही दस्तखत करते थे । मुझे एक ही सज्जन वहां के मिले जिन्होंने अन्य लोगों के प्रति खेद के साथ बताया कि वे देवनागरी में दस्तखत करते हैं ।

क्या निजी स्तर पर हिन्दी के प्रयोग के लिए भी कोई शासनादेश की जरूरत है ? क्या लोगों में स्वतःस्फूर्त उत्कंठा एवं उत्साह नहीं होना चाहिए ? मेरा निजी आकलन है कि इस माने में पढ़ालिखा हिन्दुस्तानी समाज तो यथास्थितिवादी एवं शून्य ही है । (चर्चा जारी रहेगी ।)
– योगेन्द्र

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