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राजभाषा और सरकारी रवैया

सितम्बर 18, 2008

देश के संविधान के अनुसार हिन्दी राजभाषा है । इस तथ्य को आम आदमी ही नहीं राजनेता तथा प्रशासनिक अधिकारी भी मानते हैं । पर राजभाषा होने का क्या अर्थ है इस पर न तो राजनेता और न ही अधिकारी ध्यान देते हैं । कुल मिलाकर हिन्दी को मिली राजभाषा की उपाधि एक कागजी निर्णय भर रह गया है । रोजमर्रा के कार्यव्यापार में इस राजभाषा के लिए कोई जगह नहीं है । जो भी जगह है वह मौखिक प्रयोग तक सीमित है, लिखित नहीं । सरकारी मुलाजिम मुंह से हिन्दी का विरोध नहीं करते । ऐसा करना खतरे से खाली नहीं है, क्योंकि तब लोगों की भाषायी भावना जाग सकती है और एक अवांछनीय स्थिति पैदा हो सकती है । इसलिए हिन्दी प्रयोग की कभी किसी कारण बात उठ जाये तो प्रशासनिक अधिकारीगण ‘बिल्कुल ठीक’ कहते हुए हामी भर लेते हैं । लेकिन साथ ही वे इस बात की भी पूरी सावधानी बरत लेते हैं कि हिन्दी कहीं सचमुच में इस्तेमाल न हो जाये । वे नहीं चाहेंगे कि ऐसी कोई बात घटे जिससे अंग्रेजी के वर्चस्व को आंच आये । अतः वे ऐसे नीतिगत निर्णय कागजों तक ही सीमित रहें इसका पूरा-पूरा खयाल रखते हैं ।

उनकी ऐसी मंशा के एक मामले का जिक्र मैं यहां पर कर रहा हूं । कोई दो वर्ष पहले अखबारों में एक विज्ञप्ति छपी थी, (min-chemfert-goi पर क्लिक करें) जिसके माध्यम से दवा-कंपनियों के लिए एक शासनादेश जारी किया गया था कि वे अपने उत्पादों के रैपरों/पैकिंगों पर दवा का नाम, दाम, बैच संख्या, आदि का हिन्दी में भी उल्लेख करें । यानी संबंधित जानकारी हिन्दी तथा अंग्रेजी, दोनों, में उल्लिखित रहे । विज्ञप्ति में स्पष्टतः मुद्रित है कि ऐसा करना अनिवार्य (mandatory) है ।

आज करीब दो वर्ष बीत चुके हैं । स्थिति जैसी की तैसी है । मैंने एक-दो बार संबंधित मंत्रालय को इस बारे में लिखा था । मेरे पत्र कूड़ेदान में चले गये होंगे इसमें मुझे कोई संदेह नहीं । क्यों कुछ नहीं हुआ इस दिशा में ? कारण साफ है, संबंधित मंत्रीजी के दिमाग में ये बात आयी होगी और अधिकारियों ने उनके चाहे अनुसार कागजी कार्यवाही कर दी होगी । लेकिन उससे आगे न बढ़ने का भी संकल्प उन्होंने ले लिया होगा । बलिहारी है अंग्रेजी-भक्त प्रशासन की । अब सूचना-अधिकार के कानून के तहत लिखा-पढ़ी की जाये तो शायद उनकी स्वांग में ली जा रही नींद खुले । – योगेन्द्र ‘मिथ्याभाषी’

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