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बालाजी प्रतिमा

आंध्र प्रदेश की तमिलनाडु सीमा के निकट तिरुमल क्षेत्र में अवस्थित श्री वेंकटेश्वर (बैकुण्ठेश्वर? भगवान् विष्णु) मंदिर विश्वप्रसिद्ध है । कई लोग तिरुपति मंदिर के नाम से ही इसे जानते हैं, जब कि तथ्य यह है कि तिरुपति सप्तगिरि पर्वतशृंखला के तलहटी पर मैदानी भूभाग में स्थित आंध्र प्रदेश का एक बड़ा नगर है, जहां बस, रेल तथा हवाई मार्ग से पहुंचा जा सकता है । उक्त सप्तगिरि तिरुमल पर्वतमाला के सात प्रमुख शिखर क्रमशः शेषाद्रि, नीलाद्रि, गरुडाद्रि, अंजनाद्रि, वृषभाद्रि, नारायणाद्रि, एवं वेंकटाद्रि गिनाये जाते हैं । इन्हीं में से एक, वेंकटाद्रि या वेंकटाचल, शिखर पर श्री स्वामी पुष्करिणी नाम के पवित्र जलकुंड के किनारे वेंकटेश्वर मंदिर स्थित है । इस पवित्र स्थल के बारे में एकाधिक पौराणिक कथाएं प्रचलन में हैं । मंदिर आदि के बारे में विस्तृत जानकारी तिरुमल की वेबसाइट (www.tirumala.org/) पर उपलब्ध है । उक्त शिखर की समुद्रतल से ऊंचाई करीब 874 मीटर अथवा 3200 फिट है । तिरुपति नगर से मंदिर तक जाने का अखंड चढ़ाई वाला एक पैदल मार्ग (करीब 15 किमी) समर्पित श्रद्धालु प्राचीन काल से प्रयोग में लेते आ रहे हैं । किंतु अब प्रायः सभी दर्शनार्थी 22-23 किमी की बस यात्रा से मंदिर पहुंचते हैं । भगवान् वेंकटेश्वर बालाजी के नाम से अधिक जाने जाते हैं । इन्हें श्रीनिवास तथा पेरुमल से भी कई लोग संबोधित करते हैं । पर्वत-शिखर के अपेक्षया समतल या हल्के उतार-चढ़ाव वाला मंदिर परिसर उसके आसपास का हराभरा विस्तृत भूभाग और किंचित् दूरी पर स्थित अन्य वृक्षाच्छादित पर्वत-चोटियां वास्तव में रमणीय दृश्य प्रदान करती हैं । ऊंचाई पर स्थित होने के कारण यहां का वायुमंडल भी ठंडा रहता है ।

Tirumal Tirupati Devasthanam

बालाजी मंदिर की पूरी व्यवस्था ‘तिरुमल तिरुपति देवस्थानम्’ (Tirumala Tirupati Devasthanam, TTD) नामक निधि या ट्रस्ट के अधीन है । वस्तुतः मंदिर परिसर और उसके परितः समस्त क्षेत्र उसी के नियंत्रण में है । वहां पर रुकने और भगवद्दर्शन की पूरी व्यवस्था देवस्थानम् के हाथ में रहती है, जिनके लिए अंतरजाल के माध्यम से संपर्क साधा जा सकता है, अथवा आवश्यकतानुसार दो-एक दिन का समय अपने हाथ में रखते हुए वहां पहुंचा जा सकता है । रुकने की व्यवस्था सस्ती तो है, परंतु उसकी उपलब्धता की शंका बनी रहती है । माना जाता है कि बालाजी मंदिर विश्व का सबसे धनी मंदिर है, जिसकी चढ़ावे या दान से प्राप्त आमदनी 6 अरब रुपये सालाना तक आंकी जाती है । मंदिर निधि अपनी आमदनी का उपयोग विविध सामाजिक एवं सामुदायिक कार्यों, यथा चिकित्सालय तथा विद्यालय बनवाने आदि, में खर्च करती है । परिसर और उसके आसपास के क्षेत्र को साफ-सुथरा रखने में भी उक्त निधि की ओर से कोई कोरकसर नहीं रहती है । तिरुमल के नागरिक क्षेत्र में एक स्थल से दूसरे तक आने-जाने के लिए निःशुल्क बस सेवा भी यह निधि प्रदान कर रही है । यहां आने वाले दर्शनार्थियों की प्रतिदिन की संख्या 50-50 हजार तक पहुंच जाती है, और पर्व आदि के अवसर पर, विशेषतः ब्रह्मोत्सवम् के मौके पर, 4-5 लाख तक हो सकती है ऐसा अनुमान व्यक्त किया जाता है । यूं बिना शुल्क आदि के दर्शन की व्यवस्था मंदिर पर अवश्य है, परंतु ऐसा दर्शन आम तौर पर श्रमसाध्य तथा समयसाध्य सिद्ध होता है । लंबी-लंबी पंक्तियों में खड़े होकर घंटों प्रतीक्षा के बाद आपको एक हॉल में पहुंचना होता है जहां फिर इंतजार करना पड़ता है । एक बार वहां प्रविष्ट होने के बाद बाहर निकल पाना सामान्यतः संभव नहीं होता; दर्शन के बाद ही निकास द्वार से बाहर निकला जा सकता है । सशुल्क दर्शन के लिए 50-60 रुपये के टिकट भी उपलब्ध रहते हैं । तब भी पंक्तिबद्ध होना ही पड़ता है, भले ही पंक्ति अपेक्षया छोटी रहती है और दर्शन में समय कम खर्च होता है । इसके अतिरिक्त कुछ सैकड़े या हजार रुपयों वाली पूजा-अर्चना की ‘विशेष सेवा’ की भी व्यवस्था श्रद्धालुओं के लिए रहती है ।

तिरुमल में यात्रिकों, दर्शनार्थियों की भीड़ तो हर रोज रहती ही है, किंतु धार्मिक महत्ता की तिथियों पर भीड़ कुछ अधिक होती है । यहां वर्ष भर आये दिन कोई न कोई उत्सव आयोजित होता रहता है, जिनमें सर्वाधिक महत्त्व का है शरदकालीन ब्रह्मोत्सवम् । यह उत्सव शारदीय नवरात्र आश्विन मास – सामान्यतः अक्टूबर-नवंबर – के शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से नवमी तिथि तक के नौदिवसीय कालखंड में आयोजित होता है । यह वह समय होता है जब बालाजी के दर्शन कर पाना कठिन होता है । जब तक पुख्ता इंतजाम न किये गये हों तब तक इस महोत्सव के दौरान तिरुमल जाने का विचार न करना ही उचित कहा जायेगा । – योगेन्द्र

4 Responses to “► बालाजी मंदिर, तिरुमल”

  1. devkaran sen sustani district rajgarj m.p Says:

    jay govinda

    • योगेन्द्र जोशी Says:

      मैं ठीक-से समझ पाया कि आप्का प्रश्न क्या है। यदि आप जानना चाहते हैं कि वहां भीड़ कब कम रहती है तो मेरा अनुमान है कि दिसंबर-जनवरी माह ही उपयुक्त हैंं। उस समय कोई विशेष त्योहार नहीं रहते हैं। मकर संक्रान्ति का माहात्य स्नानादि कर्मों में निहित होता है। गर्मी के समय में छुट्टियां अधिक होती हैं और लोग उस स्थल में “हिल-स्टेशन” के तौर पर आते हैं। कन्याकुमारी में मुझे स्थानीय लोगों ने बताया कि जनवरी सबसे अच्छा रहता है। शायद वह तिरुमल के के लिए भी लागू होता है।


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