भारतीय अपनी ही भाषाओं का तिरस्कार क्यों करते हैं?

मार्च 24, 2013

भारतीय (बेहतर होगा इंडियंस कहना ) अपनी ही भाषाओं का तिरस्कार क्यों करते हैं? इस सवाल का सर्वस्वीकार्य उत्तर शायद ही कोई दे सकता हो; हां अपनी-अपनी सोच के अनुसार लोग तमाम संभावनाओं की चर्चा कर सकते हैं । इस विषय में मेरे अपने कुछ विचार हैं किंतु उनका उल्लेख मैं इस आलेख में नहीं कर रहा हूं । इस समय मैं एक हालिया (7 मार्च) लेख की चर्चा करना चाहता हूं जो मुझे इकॉनॉमिस्ट-डाट-कॉम पर पढ़ने को मिला था । उसमें उल्लिखित कुछ बातें में यहां प्रस्तुत कर रहा हूं। उसमें कही गई जो बात मुझे खास लगी वह है “प्रायः सभी समाजों में लोग अपनी भाषाओं से अत्यंत लगाव रखते हैं। हिंदी एक अपवाद है।”  अंग्रेजी में लिखित इस लेख का शीर्षक है “The keenest Wikipedians(क्लिक करें) ।

10 लाख से अधिक विकीपीडिया लेख

लेख के अनुसार ‘विकीपीडिया’ विभिन्न भाषाओं में लिखित लेखों का भंडार बन चुका हैं, जिसमें उपलब्ध कई लेख अत्यंत उपयोगी पाए जाते हैं, पर सभी नहीं । विश्व की पांच भाषाओं में 10 लाख से भी अधिक लेख छप चुके हैं । ये भाषाएं हैं: अंग्रेजी (English), जर्मन (German), फ्रांसीसी (French), इतालवी (Italian), एवं डच (Dutch) ।

लेख में बताया गया है कि यूरोप के नेदरलैंड राष्ट्र के 100 प्रतिशत डचभाषी छात्र अंग्रेजी भी पढ़ते हैं, और प्रायः हर नागरिक फर्राटे से अंग्रेजी बोल सकता है । ऐसा क्यों है कि अंग्रेजी जानने के बावजूद डच भाषा में इतने अधिक लेख छपते हैं, जब कि उस देश की जनसंख्या मात्र लगभग 1.7 करोड़ है ? लेखक के अनुसार इसका कारण मात्र यह है कि अन्य भाषाओं की अच्छीखासी जानकारी रखने के बावजूद लोग अपनी भाषाओं से अत्यंत लगाव रखते हैं और उसे ही इस्तेमाल करने की इच्छा रखते हैं ।
अपनी उस भाषा को जिसे लोग छोड़ने की नहीं सोचते उसे लेखक ने “अंडरवेयर लैंग्वेज” (Underwear Language) की संज्ञा दी है ।

1 से 10 लाख तक के लेख

अन्य भाषाओं, जिनके 1 लाख से अधिक लेख विकीपीडिया पर उपलब्ध हैं, में रूसी, अरबी एवं चीनी शामिल हैं । किंतु दिलचस्प तो यह है कि ऐसी भी कुछ भाषाएं हैं जो किसी देश की भाषा के रूप में स्थापित नहीं हैं, फिर भी उनमें छपे लेख 1 लाख से कम नहीं हैं, क्योंकि उन्हें बोलने वाले लोग है और वे उनका भरपूर प्रयोग करने का इरादा रखते हैं । इनमें शामिल हैं स्पेन में प्रचलित गैलिशियन (Galician), बास्क (Basque) तथा कैटलैन (Catalan) भाषाएं । ये स्पेन के उन बाशिंदों की भाषाएं हैं जो स्पेनी बोल सकते हैं और उसे इस्तेमाल भी करते हैं, फिर भी अपनी भाषाओं को प्रयोग में लेना पसंद करते हैं । लेख के अनुसार उक्त तथ्य इस बात का संकेत देता है कि लोग अपनी भाषाओं के प्रति विशेष लगाव रखते हैं ।

परंतु इससे अधिक चकित करने वाली बात तो यह है कि एस्परांटो (Esperanto, यूरोपीय भाषाओं में प्रचलित आम शब्दों पर आधारित एक कृत्रिम भाषा) में करीब 176,800 लेख विकीपीढिया में मिलते हैं । इसी प्रकार वोलापुक (Volapuk, एक अन्य कृत्रिम भाषा, जो लैटिन क्रियाओं को प्रयोग में लेते हुए मुख्यतः अंग्रेजी एवं कुछ सीमा तक जर्मन एवं फ्रांसीसी पर आधारित है) में 119,091 लेखों के छपे होने की बात कही गई है । यह भी जानकारी दी गई है कि इसके बोलने वाले कुछ गिने-चुने लोग ही हैं । फिर भी इतनी बड़ी संख्या में लेखों पर ताज्जुब ता होता ही है । ऐसा प्रतीत होता है कि किसी ने ‘ऑटोट्रांसलेशन’ के जरिये अन्य भाषाओं के लेख वोलापुक में डाल दिए हों ।

दिलचस्प यह है कि विकीपीढिया पर वोलापुक के लेखों की संख्या हिंदी में उपलब्ध लेखों से अधिक है । ऑटोट्रांसलेशन के माध्यम से तो हिंदी में भी लेख छप सकते हैं । फिर किसी ने ऐसा प्रयास क्यों नहीं किया होगा ?

हिंदी को लेकर लेखक की टिप्पणी सीधी-सी है: हिंदी कदाचित् ‘भाषाई लगाव के सिद्धांत’ का एक अपवाद है । अर्थात् हिंदीभाषी स्वयं अपनी भाषा से लगाव नहीं रखते और अंगरेजी लेखों का ही अध्ययन करते हैं । जब आपकी अपनी भाषा में रुचि ही न हो तो उसमें लेख लिखने की जहमत क्या उठाएंगे? यह स्थिति तब है जब हिंदी में लिखित रचनाओं की कोई कमी नहीं और इसके बोलने वाले लोगों की संख्या दशियों करोड़ों में है – किसी भी यूरोपीय भाषा के बोलने वालों से अधिक ।

1 लाख से कम लेख

लेखक ने इस पर आश्चर्य व्यक्त किया है कि अलेमानिक (Alemannic) पीडमोंटीज (Piedmontese) जावानीज (Javanese) में भी लेखों की संख्या (क्रमशः 13,708, 59,303, तथा 43,122) निराशाप्रद है, जब की इनके भाषाभाषियों की संख्या करोड़ों में है । स्पष्ट है कि संबंधित लोग उन अन्य भाषाओं में लेख पढ़ते हैं जिन्हें वे जानते हैं ।

आगे यह भी जानकारी दी गई है कि हावजू (Zhosa) में मात्र 146 लेख ही उपलब्ध हैं । इस भाषा के जानने वालों की संख्या करीब 80 लाख बताई गई है और यह भी कि नेल्सन मंडेला की मातृभाषा है । अपनी भाषाओं के प्रति उदासीनता काफी व्यापक है, और यह उसका एक उदाहरण है ।

विकीपीडिया लेखों के भाषाई आधार पर विभाजन के अध्ययन में एक भाषा हेरेरो (Herero, कुछ अफ्रिकी देशों में बोली जाने वाली भाषाओं में से एक) का भी जिक्र है, जिसमें एक भी लेख शामिल नहीं है, यद्यपि उसका होमपेज बना हुआ है

भाषाई गहराई

लेखक ने भाषाई गहराई (Depth of Language) को भी परिभाषित किया है । अध्ययनकर्ता के अनुसार अहमियत केवल इस बात की नहीं होती है कि कितने लेख अमुक भाषा में लिखित पाए जाते हैं । यह बात भी अहमियत रखती है कि उन लेखों को कितना संपादित किया जाता है, जो लोगों की सक्रिय दिलचस्पी का द्योतक हैं । भाषाई गहराई को दोनों (संख्या एवं गहराई) के अनुपात के तौर पर परिभाषित किया गया है । उम्मीद के अनुरूप 42 लाख लेखों के साथ अंगरेजी अन्य भाषाओं के बहुत आगे पाई गई है । रोचक तथ्य यह भी है कम लेखों के बावजूद हिब्रू, अरबी, फारसी, तथा तुर्की इस गहराई के मामले में जर्मन एवं इतालवी के आगे हैं । हिंदी कहां पर है इसका जिक्र नहीं किया गया है । चीनी भाषा की चर्चा भी कहीं नहीं दिखी ।

बहरहाल इस दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य पर अपने देशवासियों को विचार करना चाहिए कि जिस भाषा को राजभाषा का तमगा पहनाया गया है और जो अनेकों जनों की मातृभाषा है, उसी के बोलने वाले उसे इतनी हिकारत की निगाह से क्यों देखते हैं । क्या यह हमारी मानसिक ग़ुलामी का द्योतक है, यानी कि देश राजनैतिक तौर पर तो आज़ाद हो गया लेकिन दिमागी तौर पर नहीं । हाल में संघ लोकसेवा आयोग (UPSC) की परीक्षाओं में अंगरेजी का कद बढ़ाने और देशी भाषाओं को हासिये पर डालने का निर्णय इसी मानसिकता का संकेतक है । (फ़िलहाल वह निर्णय टल गया है ।) - योगेन्द्र जोशी

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3 Responses to “भारतीय अपनी ही भाषाओं का तिरस्कार क्यों करते हैं?”


  1. बहुत बढ़िया भाई। मेरे ब्‍लॉग chandkhem.blogspot.in पर (अपना हिन्‍द अपनी हिन्‍दी) नामक आलेख आपको इसी समस्‍या की ओर इंगित करता प्रतीत होगा।

  2. kuldeep Says:

    if i will speak hindi in karnataka people will kill me (already got attacked so many times) so better to speak english and live.

  3. kuldeep Says:

    कन्नड़ या इंग्लिश लेकिन हिंदी नहीं


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