विश्व की व्यावसायिक भाषाओं में भारतीय भाषाओं का नाम नहीं !!
मुझे अपने ‘भारत महान्’ की बात समझ में नहीं आती है । महान् तो कह दिया लेकिन किस तारीफ में ? भ्रष्टाचार में अव्वल होने पर ? राजनैतिक बेहयाई पर ? लोगों की संवेदनहीनता पर ? उनकी स्वार्थपरता पर ?या फिर समाज में व्याप्त कुंठा अथवा हीन भावना पर, जिसके तहत हर विदेशी चीज को इस देश ने श्रेष्ठतर मानने और उन्हें अपनाने का व्रत पाल रखा है , जिसका नतीजा भारतीय भाषाओं के हालात के तौर हम देखते हैं ।
चार-छः दिन पहले मुझे एक ई-मेल के माध्यम से इस ऐसी वेबसाइट का पता मिला,
(http://media.bloomberg.com/bb/avfile/roQIgEa4jm3w)
इसमें उन देशों की सूची दी गयी है जहां अंग्रेजी के अलावा अन्य भाषाएं भी व्यावसायिक कार्यों में प्रयुक्त होती है । उस पर आधारित इस जानकारी पर गौर करें:
व्यावसायिक भाषाएं
अरबी (Arabic) 25 करीब करोड़ (23)
इतालवी (Italian) करीब 6 करोड़ (4)
कोरियाई (Korean) करीब 7 करोड़ (1)
चीनी मैंडरिन (Chinese Mandarin) 100 करोड़ से अधिक (1)
जर्मन (German) 12-13 करोड़ (6)
जापानी (Japanese) 12-13 करोड़ (1)
तुर्की (Turkish) 6-7 करोड़ (1)
पुर्तगाली (Portuguese) करीब 20 करोड़ (8)
फ्रांसीसी (French) 12-13 करोड़ (27)
रूसी (Russian) 25-26 करोड़ (4)
स्पेनी (Spanish) करीब 40 करोड़ (20)
नोटः- संबंधित भाषा के नाम के आगे उसे बोलने/समझने वालों की अनुमानित संख्या दी गयी है । पंक्ति के अंत के कोष्ठकों में उन देशों की संख्या है जहां भाषा को आधिकारिक होने का दर्जा प्राप्त है ।
अंग्रेजी
इस बात पर ध्यान दें कि विश्व में उन लोगों की संख्या 40 करोड़ के लगभग आंकी जाती है जिनकी प्रथम भाषा अंग्रेजी है । किसी-किसी वेबसाइट पर इसे करीब 50 करोड़ भी बताया गया है, जिसमें हिंदुस्तान के 9-10 करोड़ ‘अंग्रेजीभाषी’शामिल हैं ।
मैंने तत्संबंधित जानकारी विकीपीडिआ, एवं नेशनमास्टर, और विस्टावाइड वेबसाइटों से जुटाई । यों अंतरजाल पर तमाम अन्य साइटें मिल जाएंगी । हिंदुस्तान से जुड़ी जानकारी मुझे अविश्वसनीय लगती है । निःसंदेह इस देश में अंग्रेजी समझने और कुछ हद तक पढ़-लिख सकने वाले काफी हैं, लेकिन फिर भी वह संख्या 10 करोड़ पहुंचती होगी इसमें शंका है । दुनिया में अन्य स्थानों पर भी अंग्रेजी जानने वाले हैं, परंतु उनकी संख्या का भरोसेमंद आंकड़ा मुझे खोजे नहीं मिला । अधिकांश देशों में यह संख्या काफी कम है, जैसे चीन, जापान एवं कोरिया । वैसे सच बात यह है कि उत्तरी अमेरिका, पश्चिमी यूरोप, तथा ब्रितानी उपनिवेश रह चुके विश्व के देशों को छोड़कर अन्यत्र अंग्रेजी जानने वाले आपको बहुत कम मिलेंगे । कुल मिलाकर अंग्रेजी चीनी मैंडरिन से पर्याप्त पीछे है । यह बात अलग है कि हिंदुस्तानियों में यह भ्रम व्याप्त है कि अंग्रेजी तो सर्वत्र बखूबी चलती है । कौन समझाये उन्हें ? कौन तोड़े लोगों के भ्रम को ।
भारतीयों, बेहतर होगा इंडियनों कहना, को यह समझना चाहिए कि अंग्रेजी अंतरराष्ट्रीय केवल इस अर्थ में है कि अंतरराष्ट्रीय प्रकृति के कारोबार में प्रायः अंग्रेजी इस्तेमाल होती है, जैसे हवाई यात्राओं की व्यवस्था में, आयात-निर्यात के कार्य में, और वैश्विक महत्ता के मुद्दों की जानकारी लेने-देने आदि में । परंतु अंग्रेजी के अंतरराष्ट्रीय होने का अर्थ यह हरगिज नहीं कि दुनिया के देशों के आंतरिक कामकाज में भी अंग्रेजी ही चलती है । आपने कभी गौर किया है कि जापानी शेयर-मार्केट के प्रदर्शन-पट्टों पर जापानी दिखती है, न कि अंग्रेजी । आपके लिए वहां के आम रेस्तरां में चाय-नास्ते का आर्डर देना भी कठिन हो सकता है, रोजमर्रा का आम निबटाना तो दूर की बात । तथ्य यह है कि चीन, जापान, ब्राजील, अर्जेन्टिना में समस्त आंतरिक व्यावसायिक गतिविधियां अपनी-अपनी भाषाओं में होता है । लेकिन इन बातों को इंडियनों को कौन समझाए ?
चीनी मेंडरिन
चीनी मैंडरिन राजधानी बीजिंग शहर के आसपास की चीनी भाषा पर आधारित और सरलीकृत है, जिसमें आधिकारिक कार्य संपन्न होते हैं । यह कम ही लोग जानते होंगे कि चीन में सर्वत्र चीनी भाषा एक जैसी नहीं बोली जाती है, लेकिन लिपि और लिखित चिह्न के अर्थ सर्वत्र एक होने से दस्तावेज सर्वत्र सरलता से पढ़े-समझे जा सकते हैं । अगर भारत में सर्वत्र देवनागरी स्वीकारी जाती, तो हिंदी के दस्तावेज पढ़ पाना और कुछ हद तक उन्हें समझ पाना अधिकतर लोगों के लिए संभव होता, कदाचित् दक्षिण भारतीयों को छोड़कर । राजनैतिक कारणों से ऐसा किया नहीं गया ।
गौर करें कि किसी भी भारतीय भाषा का नाम ऊपर दी गयी सूची में नहीं है, राजभाषा का खिताब पाई हिंदी भी नहीं, जब कि यहां की कई भारतीय भाषाओं के जानने वालों की संख्या कोरियाई, तुर्की तथा अन्य भाषाओं के ज्ञाताओं से अधिक है । हिंदी जानने वालों की संख्या 50 करोड़ से अधिक आंकी जाती है, क्योंकि हिंदीभाषी क्षेत्रों की जनसंख्या ही स्वयं में बहुत है । जहां तक बोलने-समझने वालों की बात है, अन्य भारतीयों एवं पाकिस्तानियों को मिलाकर यह संख्या 65 करोड़ को पार कर जाती है । दुनिया की सर्वाधिक बोली-समझी जाने वाली भाषाओं में दूसरे, तीसरे अथवा चौथे क्रम (इस संदर्भ में मतैक्य नहीं लगता) पर होने के बावजूद भी इस भाषा को व्यावसायिक क्षेत्र में दस्तावेजी स्तर पर कोई अहमियत नहीं मिली है । मौखिक कारोबार इस देश में हिंदी बोलकर बहुत होता है; बिना उसके कइयों का काम ही न चले । किंतु व्यवसायीगण दस्तावेजी स्तर पर अंग्रेजी पर ही उतरते हैं । अजीब हाल हैं देश के कि बोलें हिंदी लिखें अंग्रेजी !
चीन की हालिया आर्थिक प्रगति और वैश्विक राजनीति में उसकी बढ़ती अहमियत के चलते मैंडरिन का महत्व तेजी से बढ़ रहा है । चंद रोज पहले अंतरजाल के एक लेख में मुझे डेविड ग्रैडल (David Graddol) नामक विशेषज्ञ का यह कथन पढ़ने को मिलाः
“… other languages such as Spanish, Arabic, Hindi/Urdu and Chinese are growing faster than English. The populations who use these languages are younger and have greater potential for economic expansion…”
हिंदी की दशा
‘हमारी राजभाषा’ ‘हमारी राजभाषा’ रटने में हमारी सरकारें पीछे नहीं रहती हैं, और १४ सितंबर के दिन उसके प्रचार-प्रसार एवं प्रयोग पर बहुत-सी बातें कही जाती हैं । (जुबानी जमाखर्च में वे भी नहीं चूकते जिनके मन में विरोध रहता है ।) परंतु व्यावसायिक कार्य में वही सरकारें किसी न किसी बहाने अंग्रेजी का ही दामन थामे रहती हैं । जब सरकारें ही राजभाषा से विरत रहें, तो निजी संस्थाओं से क्या उम्मीद करें । यह हाल तब है जब कि देश का आम आदमी अंग्रेजी न जानता है, न समझता है, सार्थक अभिव्यक्ति तो बहुतों के वश की बात ही नहीं । महज रोमन लिपि से परिचित होना और उसके कुछ शब्द सीख लेना अंग्रेजी जानना नहीं होता है ।
लगता है कि इंडियनों ने अपनी भाषाओं से परहेज की कसम खा रखी है । इसके विपरीत अन्य प्रमुख देशों में अपनी भाषाओं के प्रति लगाव घट नहीं रहा है । जानकारों का मानना है कि भविष्य में चीनी मैंडरिन अंग्रेजी के साथ-साथ, अथवा उसके विकल्प स्वरूप, विश्व की व्यावसायिक भाषा बनने जा रही है । दरअसल मैंडरिन को आगे बढ़ाने में चीन प्रयत्नशील है । इस समय अमेरिका में सर्वाधिक सीखी जा रही भाषा वही है । दो साल पहले मुझे यह देखकर थोड़ा अचरज हुआ कि अमेरिका के सिलिकॉन वैली के कुछ प्राथमिक विद्यालयों में मैंडरिन भी द्वितीय भाषा के तौर पर पढ़ाई जाती है । उस क्षेत्र में चीनी एवं कोरियाई लिपि में सूचनापट्ट देखने को मिल जाएंगे ।
संभव है कि डेविड ग्रैडल का उपर्युक्त कथन सही साबित हो जाये। फिलहाल हिंदी की दशा बदलेगी ऐसा लगता नहीं । उम्मीद जगाने वाली खबरें कम ही सुनने को मिलती हैं । 10 तारीख के अपने अखबार में मुझे यह खबर दिखी:
इसे देखते हुए क्या लगता है आपको ? – योगेन्द्र जोशी
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सितम्बर 19, 2011 at 12:42 पूर्वाह्न
हम भी वर्षों से प्रयासरत है, हिंदी के वेब पर उत्थान के लिए. सदस्यों से अनुरोध करने पर भी कोई लोगो तक लगता नहीं और क्या अपेक्षा करेंगे? कम से कम ब्लॉगप्रहरी इस स्थिति में आये कि यह कॉस्ट-फ्री हो ..तो अन्य के भलाई के लिए कुछ किया जाए.
सितम्बर 26, 2011 at 3:10 अपराह्न
जोशी जी!
बहुत दिनों बाद आपकी पोस्ट आई परंतु बहुत जायज़ प्रश्न के साथ। तालीम का गौगा है, तहज़ीब का शोरस है, बरक्क़त जो नहीं होती नीयत की खराबी है।
कृपया राजभाषा विकास परिषद ब्लॉग पर एक विश्लेषण ज़रूर पढ़ें और अपनी टिप्पणी अवश्य दें। मैं सरकार की हिंदी विकास का ढोल पीटने और वास्तविक नीयत पर न्यायालय में जाना चाहता हूं। कुछ सुझाव भी दें।
सितम्बर 28, 2011 at 1:33 पूर्वाह्न
बेहतर। सच है कि कौन और कैसे समझाए अंग्रेजी के आग्रहियों को? मैं स्वयं इन आँकड़ों पर कुछ काम कर चुका हूँ और लगता नहीं कि अधिक जगह सच्चाई है। हाँ यह कह सकते हैं कि चीनी 2015 तक ही अंग्रेजी को पीछे छोड़ रही, अन्तर्जाल पर, इसका दावा किया जा सकता है। हिन्दी और अंग्रेजी को लेकर एक किताब लिख रहा हूँ, इसलिए आपसे सम्पर्क करना चाहता हूँ…