दक्षिण भारत यात्रा और हिंदी: पंचम भाग, अंग्रेजी बनाम देसी भाषाएं
समूचे देश के दर्शन कर चुकने का दावा मैं अभी नहीं कर सकता । यूं कोई भी व्यक्ति पूरे देश का भ्रमण कर भी नहीं सकता है । वस्तुतः अलग-अलग क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले कुछएक स्थानों का दर्शन कर ले कोई तो आप कह सकते हैं कि अमुक व्यक्ति ने देश घूम लिया । इस दृष्टि से मैं अपने बारे में यही कह सकता हूं कि अब तक काफी कुछ देख चुका हूं और वस्तुस्थिति का कुछ-कुछ अंदाजा हो चुका है मुझे ।
अपनी यात्राओं के दौरान मुझे जो भाषाई अनुभव हुआ है उसके आधार पर यह कह सकता हूं कि हिंदी-अंग्रेजी के सापेक्ष देश के नागरिकों को मोटे तौर पर तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है । प्रथमतः वे हैं जो केवल अपने क्षेत्र की भाषा बोल और समझ सकते हैं । हिंदी तथा अंग्रेजी के साथ-साथ देश की अन्य भाषाएं उनके लिए लगभग समझ से परे रहती हैं । बहुत हुआ तो उनके क्षेत्र या उसके सन्निकट के क्षेत्रों में बोली जाने वाली अन्य भाषा की थोड़ी बहुत जानकारी उनको हो सकती है । ऐसा मैंने तिरुमल तिरुपति देवस्थानम् (TTD अर्थात् तिरुपति के निकट का विश्वप्रसिद्ध बालाजी बेंकटेश्वर मंदिर का क्षेत्र) में देखा है । तिरुमल देवस्थानम् है तो आंध्र प्रदेश में, किंतु यह तमिलनाडु की सीमा से बमुश्किल ७०-७५ कि.मी. की दूरी पर है (चेन्नै शहर से १५२ कि.मी.) । अतः यहां पर तमिल का भी चलन है और ऐसे लोग दिख जायेंगे जो तेलुगू के साथ तमिल भी जानते हैं । लेकिन हिंदी एवं अंगे्रजी उन्हें नहीं आती ।
द्वितीय श्रेणी में वे हैं जो थोड़ी-बहुत हिंदी जानते हैं और जिन्होंने हिंदी मुख्यतः व्यावसायिक कारणों से सीखी है । ये लोग होटलों-रेस्तरांओं में काम करते हैं, या किसी पर्यटक या दर्शनीय स्थल के पास चायपान या छोटी दुकान चलाते हैं, या रिक्शा, आटोरिक्शा, टैक्सी आदि चलाते हैं, इत्यादि । इनकी हिंदी मुख्यतया देश के विभिन्न कोनों से आने वाले हर प्रकार के पर्यटकों-यात्रिकों के संपर्क पर टिकी रहती है – ऐसे पर्यटक-यात्रिक जिनमें से कई स्वयं अच्छी अंग्रेजी जानते या हिंदी से काम चलाने में सुविधा महसूस करते हैं । इस श्रेणी के लोग अधिक पढ़े-लिखे नहीं होते, कम से कम आज के तथाकथित अंग्रेजी स्कूलों में ‘कांवेंट’-एजूकेटेड तो हरगिज नहीं होते हैं, जिससे अंग्रेजी बोलने-समझने की काबिलियत पा सके हों । इनकी हिंदी मात्र काम-चलाऊ कही जायेगी । फिर भी वह इनकी अंग्रेजी से बेहतर ही होती है ।
तृतीय श्रेणी में मैं उनको गिनता हूं जो पर्याप्त पढ़े-लिखे होते हैं, सरकारी और निजी व्यावसायिक संस्थाओं/कार्यालयों में कार्य करते हैं, या माध्यमिक अथवा उसके ऊपर के शिक्षण संस्थाओं में कार्यरत रहते हैं, खासकर आजकल के अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में । आम तौर पर ये क्षेत्रीय भाषाएं जानते हैं, और कइयों को हिंदी का भी ज्ञान रहता है, किंतु अंग्रेजी उनकी प्राथमिकता रहती है । वे क्षेत्रीय भाषाओं अथवा मातृभाषाओं का प्रयोग आपस में तथा अपने कुटुंबीजनों के साथ करते हैं, लेकिन इस बात के हिमायती होते हैं कि लिखित रूप में अंग्रेजी ही प्रयुक्त होवे । इस श्रेणी के लोगों के लिए भारतीय भाषाओं की अहमियत सड़क पर चल रहे आम आदमी, श्रमिकों, रिक्शा-ठेले वालों, साग-सब्जी बेचने वालों, आदि के साथ वार्तालाप तक सीमित रहती है ।
यदि आप एक आम तीर्थयात्री या पर्यटक की हैसियत से अहिंदीभाषी क्षेत्र में घूम-फिर रहे हों तो आपका वास्ता सामान्यतः दूसरी श्रेणी के लोगों से रहेगा । रात्रि-विश्राम, दर्शनीय स्थलों पर आने-जाने, चाय-काफी आदि के लिए इन लोगों से मदद मिलती है । तब अधिकांश स्थलों पर हिंदी कदाचित् काम दे जायेगी । संयोग से अहिंदीभाषी से कुछ खरीद-फरोख्त करनी हो या उससे कोई जानकारी लेनी पड़े तो आसपास शायद कोई मिल जाये जो अपनी कामचलाऊ हिंदी के बल पर दुभाषिये का काम कर दे । लेकिन अगर आपको किसी व्यावसायिक या सरकारी कार्यालय में कार्य हो तब हिंदी से काम नहीं चलेगा । सरकारी कार्यालयों में क्षेत्रीय भाषा ही ठीक रहेगी, लेकिन बड़े व्यावसायिक संस्थानों में क्षेत्रीय भाषा के ऊपर अंग्रेजी ही पसंद की जायेगी । राष्ट्रीय स्तर के सम्मेलनों और गोष्ठियों में भी औपचारिक भाषाई कार्य अंग्रेजी में ही संपन्न होगा ऐसा मान के चलिए । इन स्थलों में निजी तथा पारस्परिक वार्तालाप में प्रतिभागी अंग्रेजी से इतर भाषा का प्रयोग करते हुए अवश्य मिलेंगे, लेकिन कार्यक्रम संचालन में अंग्रेजी ही दिखाई देगी । राष्ट्रीय स्तर के सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी हाल यही रहता होगा यह मेरा अनुमान है, भले ही उनमें हिंदी तथा अन्य भाषाओं के गीत-संगीत, नृत्य, नाटक आदि की प्रस्तुति हो ।
बोलचाल के स्तर पर दक्षिण भारत में कई मौकों पर हिंदी से काम चल जाता है, परंतु लिखित रूप में हिंदी शायद ही कहीं दिखे । हिंदी की पत्र-पत्रिकाएं भी आपको खोजनी पड़ेंगी और मुश्किल से कहीं मिल पायेंगी । इसके कारण हैं । कम पढ़े-लिखे लोग अपना काम क्षेत्रीय भाषाओं के स्थानीय अखबारों से चलाते हैं । अधिक शिक्षित लोग क्षेत्रीय भाषाओं के पत्र-पत्रिकाओं के साथ अथवा उनके बदले अंग्रेजी की पत्र-पत्रिकाएं चुनते हैं । बहरहाल पिछली कुछ यात्राओं के दौरान मैं एक बार मैसूर भी हो आया हूं । कन्नड़भाषी इसे मैसुरु नाम से पुकारते हैं । पौराणिक कथानकों के अनुसार इस नाम को ‘महिषासुर’ दैत्य से जोड़ा जाता है जिसका वध देवी ‘चामुंडा’ ने किया था । वहां पास की ‘चामुंडा हिल्स’ पर देवी मंदिर भी है । मैसूर से बस द्वारा एक-दिनी सैर पर मैं ऊटी भी हो आया हूं । ऊटी को ऊटकमंड, एवं पौराणिक नाम उदकमंडलम्, से भी पुकारा जाता है । यह मैसूर से सौ-एक कि.मी. दूर है । दोनों स्थानों पर मेरा काम हिंदी से चल गया था और अंग्रेजी का प्रयोग बहुत कम करना पड़ा ।
तो ये है एक ‘अपर्याप्त’ विवरण मेरे द्वारा अर्जित भाषाई अनुभवों का । इस लेखमाला की अगली (अंतिम किश्त) में तिरुमल (तिरुपति) के कुछ अनुभव । – योगेन्द्र
वाडियार राजमहल, मैसूर
ऊटी (समुद्रतल से सात हजार फ़िट) की झील
बस से ऊटी (नीलगिरि पहाड़ी) जाते समय का एक दृश्य
Tags: ऊटी, तिरुमल, दक्षिण भारत यात्रा, पर्यटन, मैसूर, TTD
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